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लम्बरूराम की समृद्धि का स्टोर


धूप सेक रहे-झाकड़ी में एक परचून की दुकान चलाने में खुश भूतपूर्व पंचायत प्रधान समय से पीछे रहे एक ग्रामीण समुदाय के उस मुकम्मल बदलाव को दर्शाते हैं जो अपस्ट्रीम सतलुज घाटी में देश की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना के साकार होने से आया है।

64 वर्षीय लम्बरूराम याद करते हुए बताते हैं कि 1500 मेगावाट क्षमता के नाथपा झाकड़ी विद्युत संयंत्र की लगभग 20 वर्ष पूर्व योजना बनने से पहले धारगौरा के ग्रामीणों का मुख्य पेशा गुजारे लायक खेती करना था।

उजड़ने की आशंका से प्रतिरोध तक तथा फिर झिझकयुक्त सहभागिता से लेकर विशाल परियोजना के ड्राईंग बोर्ड से बाहर निकलकर देश की जलविद्युत परियोजना के मध्य अपना रूतबा हासिल करने तक भूतपूर्व ग्राम प्रधान आज एक तृप्त व्यक्ति हैं।

यह 1973 से 1987 के दरम्यान का वक्त था लम्बरू राम धारगौरा पंचायत के उप प्रधान थे जब विशाल हिमालयी नदी सतलुज को नियंत्रित करके बिजली पैदा करने की योजना तैयार करके एसजेवीएन ने ग्रामीणों के जीवन में प्रवेश किया।

वे बताते हैं कि उस समय कुछ ग्रामीणों ने इस योजना को ख्याली पुलाव बताया और कुछ को यह भय था कि पवित्र धरती में नदी के साथ छेड़छाड़ करने से ईश्वर का कोपभजन बनना पड़ेगा। शुरू में कुछ आशंकाएं थी तथा आने वाले बदलाव के खिलाफ विरोध था लेकिन तसल्ली होने पर ग्रामीण घटितशील विकास में सहभागी बन गए।

लम्बरूराम ने अन्य 480 परिवारों के संग परियोजना की निष्पादक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम एसजेवीएन के साथ यह सुनिश्चित करने लिए बातचीत की कि राहत एवं पुनर्वास पैकेज प्राप्त करने के लिए पुश्तैनी जमीन छोड़ने से पहले कोई भी बेघर या भूमिहीन न हो।

इससे भी बढ़कर अधिग्रहित जमीन के लिए दी गई क्षतिपूर्ति के अलावा सर्वाधिक प्रभावित परिवारों के एक सदस्य के लिए कंपनी ने एक नौकरी सुनिश्चित की।

परियोजना में अपनी पुश्तैनी 46.5 बीघे में से 46 बीघे जमीन छोड़ना लम्बरू राम के लिए वास्तव में दर्दनाक था। हालांकि क्षतिपूर्ति के तौर पर 24000/- रुपए प्रति बीघा की दर से एक अच्छी रकम उस समय प्राप्त हो गई।

लम्बरूराम की समृद्धि का स्टोर झाकरी परियोजना प्रभावित के लिए एसजीवीएन द्वारा निर्मित पुनर्स्थापन कालोनी

एक परियोजना प्रथा के रूप में तथा कंपनी की नीति के हिस्से के रूप में कोई भी भूमिहीन न रहे (भूमिहीन - जिसके पास पांच बीघे से कम भूमि हो) इसके लिए एसजेवीएन ने आगे आकर अन्यत्र अतिरिक्त जमीन खरीदी, जिससे कि लम्बरूराम के पास न्यूनतम भूमि धारिता रहे।

सिर्फ ग्राम प्रधान ही नहीं, 112 परियोजना प्रभावित परिवारों के पास न्यूनतम 5 बीघे भूमि रहे इसके लिए 12.3 करोड़ रुपए खर्च करके भूमि खरीदी गई, ताकि वे भूमिहीनों में शुमार न हों।

इन 112 प्रभावित परिवारों में से 21 परिवारों को निर्मित मकानों की चाबियां सौंपी गई। अन्य ने अन्यत्र अपनी पसंद के घर बनाने के लिए एकबारगी तौर पर 45000/- रुपए की नकद क्षतिपूर्ति प्राप्त की।

वायदे के मुताबिक लम्बरूराम के तीन लड़कों में से एक पुत्र को एसजेवीएन में 61 अन्य परियोजना प्रभावित परिवारों की माफिक एसजेवीएन में पक्की नौकरी दी गई।

परियोजना से ही फायदे के रूप में लम्बरूराम के दूसरे पुत्र को स्वरोजगार मिला। उसने एक टैक्सी खरीदी जो एसजेवीएन ने लम्बी अवधि के लिए भाड़े पर लगाई।

एक बड़े एसजेवीएन परिवार के सदस्य के रूप में तीसरा पुत्र भी पीछे नहीं रहा और परियोजना क्षेत्र में लघु संविदाएं निष्पादित कर रहा है।

ग्रामीण समुदाय में बदलाव आने पर लम्बरू का नेतृत्व समुदाय के मध्य तब स्थापित हो गया जब उसने 1995 में प्रधान के पद के लिए पंचायत चुनाव लड़ा और पक्का जीत लिया।

2000 में अपना कार्यकाल खत्म होते-होते नेतृत्व युवा पीढ़ी को सौंपकर पंचायत प्रधान ने चलह-पहल से लबालब उस झाकड़ी टाऊîनशिप की जरूरतों के लिए एक परचून की दुकान खोल ली, जिसने पीछे छूट चुके घाटी की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदल दिया है।.

लम्बरूराम की पत्नी का मानना है कि लकड़ी जलाकर चूल्हे पर खाना बनाने, दूर स्थानों से पानी खुद ढोकर लाने से लेकर गैस ईंधन वाली रसोई, नल के पानी, अच्छी चिकित्सा सुविधाओं तथा हमारे पोती-पोतों को शिक्षा प्रदान करने के लिए दिल्ली पब्लिक स्कूल की एक शाखा तक का धारगौरा पंचायत ने एक लम्बा सफर तय किया है।

लम्बरू फर्माते हैं कि जहां एक ओर इस विशाल परियोजना ने बलशाली सतलुज को बांधकर 2004 में विद्युत उत्पादन की शुरूआत की और अब देश की बिजली की जरूरतें पूरी करती है वहीं दूसरी ओर पुश्तैनी भूमि देने वाले हम बाशिन्दें, जिन्होंने इसे बनते देखा है, भी इससे बराबर लाभान्वित हुए हैं और गर्वान्वित हैं।

उत्तर कथा

1500 मेगावाट क्षमता का भूमिगत संयंत्र बिजली पैदा करने के लिए चुपचाप विशाल टरबाईनें घुमा रहा है। परियोजना के 2004 में कमीशन किए जाने के बाद झाकड़ी टाऊîनशिप ने शांत मुद्रा धारण कर ली है।

पहले के खेतीपरक समाज की आज शहरी जीवनशैली है जो कईयों के लिए रोजगार तथा स्व-रोजगार मुहैया करवाती है।

लम्बरू की दुकाने से नीचे सड़क पर दो कतारों में फैले 21 घरों का एक छोटा मोहल्ला है, जहां विद्युत परियोजना की खातिर अपनी जमीन देने वाले वो परिवार आबाद हैं जिन्हें एसजेवीएन ने नए आवासों की चाबियां सौंपी थी।

   

सर्वाधिकार सुरक्षित एसजेवीएन लिमिटेड